
हिन्दी समय कार्यक्रम चल रहा था, और मशहूर रंगकर्मी और निर्देशक हबीब तनवीर जी के नाटक "चरणदास चोर" देखने के लिए भीड़ लगी हुई थी| मैं हमेशा की तरह कार्यक्रम का फिल्मांकन कर रहा था| ज्यों ही कार्क्रम ख़त्म हुआ सारी भीड़ बस हबीब जी के साथ फोटो खिंचवाने के लिए उनके आस-पास इकठ्ठा हो हो हो गई| फ़िर क्या था एक दुसरे को धक्का-मुक्की करते हुए अपनी अपनी फोटो खिंचवाने लगे| मुझे भी पहली बार मौका मिला था तो मैंने भी सोचा बहती गंगा में हाथ दो लो| फ़िर क्या था, कुछ धक्के मैंने भी खाए और कुछ खिलाये, और यही नहीं उसका फायदा भी मिला, आखिरकार मैंने भी हबीब जी के साथ एक फोटो तो खिंचवा ही ली| ज़रा देखो तो सही किस तरह से सभी खुश हो रहे हैं, किसी के चेहरे में तो झूठी हंसी साफ देखि जा सकती है| आखिर हम सब फोटो खिंचवाते हुए इतना झूठ-मूठ में क्यों मुस्कुराते रहते हैं| खैर जो भी है पर यह फोटो मेरे लिए भी हमेशा के लिए यादगार रहेगी, आखिर हबीब जी से यह मेरी पहली और आखिरी मुलाक़ात जो थी| यह तो शायद आप सभी जानते ही होंगे कि कुछ दिन पहले उनका हो गया| पर चरणदास चोर आज भी हमारे बीच में है और हमेशा रहेगा, उनकी आवाज़ बनकर| एक रंगकर्मी को मेरी ओर से श्रद्धांजली ....नमन करता हूँ मैं हबीब जी को|





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