ज़िन्दगी गुज़र जाती है एक आशियाँ बनाने में, और कुछ पल लगते हैं दिल्ली सरकार को उसे गिराने में| 15 अप्रैल को यही हुआ दिल्ली जंगपुरा स्थित इस बस्ती में| पिछले 50 सालों से बसी यह बस्ती कुछ ही मिनटों में मलवे का एक ढेर बन गयी| आए दिन यही हो रहा है दिल्ली में रह रहे गरीबों के साथ| कहने को तो राष्ट्रमंडल खेल विकास को दर्शाते हैं परन्तु विकास किसका हो रहा है और किसका नहीं यह साफ़ नज़र आ रहा है|
राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारी - रोज़ उजड़ते आशियाने
ज़िन्दगी गुज़र जाती है एक आशियाँ बनाने में, और कुछ पल लगते हैं दिल्ली सरकार को उसे गिराने में| 15 अप्रैल को यही हुआ दिल्ली जंगपुरा स्थित इस बस्ती में| पिछले 50 सालों से बसी यह बस्ती कुछ ही मिनटों में मलवे का एक ढेर बन गयी| आए दिन यही हो रहा है दिल्ली में रह रहे गरीबों के साथ| कहने को तो राष्ट्रमंडल खेल विकास को दर्शाते हैं परन्तु विकास किसका हो रहा है और किसका नहीं यह साफ़ नज़र आ रहा है|





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